नीट पेपर लीक को लेकर लगातार युवाओं के दबाव का सामना कर रहे धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। सरकार और कॉकरोच जनता पार्टी के बीच तीसरे दौर की बैठक होने के बाद जंतर मंतर पर चल रहा आंदोलन समाप्त हो गया। यह भारत का पहला ऐसा आंदोलन था जो पूरी तरह Gen – Z के कंधों पर टिका रहा। आंदोलन खत्म होने के बाद अब हर तरफ इसी बात की चर्चा हो रही है कि युवाओं ने किस तरह अपनी आदतों के दम पर एक केंद्रीय मंत्री को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया।
इस आंदोलन के लिए अपनी जान जोखिम में डालने वाले सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंगमो ने भी इसकी सफलता का श्रेय जेन-जी को दिया। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि भारत के युवाओं ने ही यह दिखाया है कि विश्वगुरु होने का असली मतलब क्या होता है। उन्होंने कहा कि इन युवाओं ने सनातन धर्म को जिया है, सिर्फ उसका उपदेश नहीं दिया। दूसरी ओर प्रियंका गांधी ने भी इस आंदोलन की सफलता को अपने लिए भावुक पल बताया और कहा कि देश का युवा जाग चुका है और उसने कमान अपने हाथ में ले ली है।
पीएम मोदी ने रील से रखी बात
जेन-जी को समझने की सबसे बड़ी मिसाल खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेश की। आमतौर पर रात आठ बजे टीवी पर आकर अपनी बात रखने वाले पीएम मोदी ने इस बार दोपहर बारह बजे इंस्टाग्राम रील के जरिए अपनी बात रखी। दोपहर बारह बजे रील शेयर करना यह दिखाता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय युवाओं के टाइम शेड्यूल को अच्छी तरह समझता है। पीएम मोदी ने अपने संबोधन की शुरुआत भी ‘मित्रों’ के बजाय ‘फ्रेंड्स’ कहकर की। इससे साफ पता चलता है कि सरकार को अहसास था कि यह आंदोलन पूरी तरह युवाओं पर केंद्रित है।
मोबाइल फोन बना आंदोलन की ताकत
जेन-जी को अक्सर ऐसी पीढ़ी माना जाता है जो हर समय फोन पर लगी रहती है और ध्यान नहीं देती। लेकिन इस पीढ़ी की खासियत यह है कि संचार के साधनों का इस्तेमाल अपनी भाषा में करना इन्हें बखूबी आता है। हर घटना को मोबाइल में रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर डालना, किसी भी परेशानी को मजाक में बदल देना और हर बात पर मीम बना लेना इसी पीढ़ी की पहचान है। यही आदत इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत बनी।
भारत में अब तक हुए किसी भी बड़े आंदोलन में मोबाइल फोन का इतना बड़ा इस्तेमाल पहले कभी नहीं देखा गया। जंतर मंतर पर हर युवा के हाथ में झंडे की जगह मोबाइल फोन था, जिसमें हर पल कैद हो रहा था। यही फोन इस आंदोलन को देश-दुनिया के हर कोने तक पहुंचाने का जरिया बना।
फोमो ने बढ़ाया आंदोलन का क्रेज
2011 से 2013 के बीच हुए आंदोलनों को अब काफी समय बीत चुका है। उस समय जेन-जी को राजनीति की गहरी समझ नहीं थी। किसान आंदोलन से भी युवा ज्यादा नहीं जुड़ पाए थे। नीट को लेकर शुरू हुए आंदोलन में युवाओं को लगा कि यह उनका अपना मुद्दा है, फिर भी शुरुआती दिनों में ज्यादा लोग नहीं पहुंचे। सोनम वांगचुक के अनशन के चौदह से पंद्रह दिन बाद भी पांच सौ से हजार लोग ही अनशन स्थल पर पहुंच रहे थे।
सोलहवें दिन से हालात बदलने लगे। सोशल मीडिया पर एक नया ट्रेंड शुरू हुआ, लोग वहां जाने लगे और नेता भी पहुंचने लगे। सोशल मीडिया पर रील शेयर होने का सिलसिला तेज हो गया। इसके बाद फोमो यानी फीयर ऑफ मिसिंग आउट का दौर शुरू हुआ, वह डर जो किसी बड़े घटनाक्रम में शामिल न हो पाने पर महसूस होता है।
सोशल मीडिया पर चले सोनम वांगचुक वाले ट्रेंड ने युवाओं को जंतर मंतर तक खींच लिया। अगले चार दिनों में हजारों लोग वहां पहुंचने लगे और सोशल मीडिया पर मीम की बाढ़ आ गई। कोई भी युवा इस आंदोलन को मिस करना नहीं चाहता था, इसी वजह से दूसरे शहरों से भी लोग दिल्ली पहुंचने लगे।
संसद मार्च के बाद बढ़ा जोश
बीस जुलाई को संसद मार्च के दौरान हजारों युवा कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले आगे बढ़ने लगे। सत्ता के गलियारों तक अपनी बात पहुंचाने का यह अनुभव युवाओं के लिए बिल्कुल नया था। हजारों की संख्या में युवाओं ने मार्च किया। दिल्ली पुलिस की लाठियों और सख्ती ने युवाओं के अंदर का गुस्सा जगा दिया, और घायलों की तस्वीरें देखकर इंस्टाग्राम पर कंटेंट की बाढ़ आ गई। चौबीस घंटे पहले पुलिस की लाठी खाकर रोने वाला युवा थोड़ी देर बाद मीम बनाकर हंस रहा था और पुलिस से पूछ रहा था कि अब लाठी नहीं मारोगे। यह हिंसा को मजाक बनाना नहीं था, बल्कि यह जेन-जी का अपना तरीका है, जिसमें किसी भी घटना को हास्य के साथ जोड़कर अपने अंदाज में बयां किया जाता है।
बीस जुलाई के मार्च के बाद कुछ नए स्लैंग भी चर्चा में आए। एक लड़की ने पुलिसवालों से पूछा कि क्या उसे हुईयां मिल सकती है, तो किसी ने पुलिसवालों के सामने ही डांस की प्रैक्टिस शुरू कर दी। किसी गेम की तरफ भागते हुए वीडियो भी पोस्ट किए गए। इन सभी रील और मीम ने एक नया ट्रेंड सेट कर दिया, जिससे युवाओं के अंदर फोमो और बढ़ गया।
घरों में बैठकर आंदोलन देख रहे लोग भी धीरे-धीरे आंदोलन में शामिल होने लगे, और देखते ही देखते छोटी भीड़ जंतर मंतर पर हजारों की भीड़ में बदल गई। लोगों ने बड़ी संख्या में रील बनाना शुरू कर दिया। जंतर मंतर पर लगे मीम और पोस्टर की वजह से रील की बाढ़ आ गई। गेट रेडी विथ मी वाले पुराने ट्रेंड की जगह लोगों ने दिल्ली पुलिस की लाठी खाने जा रही हूं वाला नया ट्रेंड शुरू कर दिया, जिस पर लाखों व्यूज आए।
किसी नेता के हाथ में नहीं रहा आंदोलन
एक व्यंग्य से शुरू हुआ कॉकरोच जनता पार्टी का यह आंदोलन युवाओं के लिए धीरे-धीरे एक जगह बन गया जहां वे जुड़ाव महसूस कर रहे थे। बीस मार्च के बाद यह आंदोलन किसी एक नेता या सोनम वांगचुक के हाथ में नहीं रहा। युवाओं को इस बात से कोई मतलब नहीं था कि वे किसके झंडे तले नारे लगा रहे हैं, वे बस नारे लगा रहे थे, तिरंगा लहरा रहे थे और इस आंदोलन का हिस्सा बन रहे थे। हर दिन भीड़ बढ़ती गई। लोग रील बना-बनाकर यह संदेश दे रहे थे कि आने वाली पीढ़ी को पता चले कि उनके माता-पिता भी इस आंदोलन में शामिल हुए थे।
इस ट्रेंड की वजह से सोशल मीडिया पर आंदोलन की चर्चा और बढ़ती गई, और लोग बड़ी संख्या में इससे जुड़ते चले गए। लगातार बढ़ते दबाव और जंतर मंतर पर जुटती भीड़ ने सरकार पर दबाव को और बढ़ा दिया। प्रधानमंत्री ने Gen – Z को संबोधित करने के लिए इंस्टाग्राम पर रील बनाई, जिस पर लाखों लाइक आए। जेन-जी के लिए धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा खुद में बड़ी बात नहीं थी, यह तो बस उनका जरिया था सरकार तक अपनी बात पहुंचाने का कि जवाबदेही तय होनी चाहिए। इसके बाद जो हुआ वह सबने देखा। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ ही जेन-जी का यह आंदोलन भी समाप्त हो गया।