केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. उन्होंने दो पन्नों की चिट्ठी लिखकर यह फैसला सुनाया. यह इस्तीफा जंतर मंतर पर हो रहे छात्रों के प्रदर्शन के बीच आया, जो पिछले कई दिनों से चल रहा था. राजनीतिक संपादक पंकज झा ने इस पूरे घटनाक्रम पर विस्तार से बात की और बताया कि नरेंद्र मोदी सरकार में यह पहला मौका है जब किसी मंत्री ने इस तरह पद छोड़ा हो
पत्रकार पंकज झा ने शुरुआत में एक पुरानी घटना का जिक्र किया. साल 2015 में तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि एनडीए सरकार में मंत्रियों के त्यागपत्र नहीं होते. उस समय ललित मोदी का मामला चल रहा था और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तथा राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर आरोप लगे थे कि उन्होंने ललित मोदी को देश से बाहर जाने में मदद की. राजनाथ सिंह का वह पुराना बयान अब फिर चर्चा में आ गया है क्योंकि खुद उनकी ही सरकार में एक मंत्री ने इस्तीफा दिया है.
इस्तीफे से पहले का माहौल
पंकज झा ने बताया कि पिछले बारह साल से मोदी सरकार को कवर करते हुए उन्होंने कभी किसी मंत्री का इस्तीफा नहीं देखा था. एक अपवाद एम जे अकबर का मामला था, जो मी टू आंदोलन से जुड़ा था. उनके अनुसार इस सरकार का एक तय तरीका रहा है, आंदोलन को दबाने का, उसे राष्ट्र विरोधी बताने का या फिर पाकिस्तान और हिंदू मुस्लिम के मुद्दे पर मोड़ देने का. किसानों का आंदोलन भी लंबा चला था, मगर सरकार ने उसे भी दबा दिया था. इस बार का प्रदर्शन अलग था. यह छात्रों का आंदोलन था, जिसका कोई एक चेहरा नहीं था. गांव गांव, शहर शहर और हर मोहल्ले में एक ही मांग सुनाई दे रही थी. सरकारी तंत्र ने पहले सोनम वांगचुक को हटाने की कोशिश की, फिर भी जंतर मंतर पर भीड़ जमा हो गई. उनका अनशन भी तुड़वाया गया. इसके बाद अभिजीत, दीपकी और सौरभ दास जैसे नाम सामने आए, फिर भी यह आंदोलन छात्रों का ही आंदोलन बना रहा.
कल जितेंद्र सिंह और जेपी नड्डा ने कॉकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधियों से बातचीत की थी, जिसमें एक ही मांग रखी गई थी, धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा. संसद में कामकाज ठप पड़ा था और आंदोलन हर दिन बढ़ता जा रहा था. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, इसलिए वहां भी बीजेपी के लिए यह मुद्दा भारी पड़ रहा था. योगी आदित्यनाथ के घर पर बीजेपी कोर कमेटी की बैठक हुई, जिसमें दोनों डिप्टी सीएम और राज्य अध्यक्ष मौजूद रहे. वहां भी बातचीत किसी और विषय पर शुरू हुई थी, पर आखिर में इसी मुद्दे पर आकर टिक गई. बीजेपी के सांसद और मंत्री मानने लगे थे कि खतरा लगातार बढ़ रहा है. प्रधानमंत्री ने आंदोलन के एजेंडे को धीरे धीरे कम करने की कोशिश की, नए कानून का वादा किया और आधी रात को राष्ट्र के नाम संबोधन भी दिया. इसके बावजूद हालात नहीं सुधरे और आखिरकार वीकेंड आने से पहले ही धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया.
जंतर मंतर पर प्रदर्शन का दृश्य
पंकज झा ने बताया कि इस्तीफे से ठीक दस मिनट पहले वे खुद जंतर मंतर पर मौजूद थे. मंच के पास जितने बच्चे दिख रहे थे, उससे कहीं ज्यादा संख्या में बच्चे बैरिकेडिंग के पीछे रोके गए थे. अचानक वहां शोर मचा और लगा कि आंसू गैस छोड़ी जा रही है. इसी बीच बच्चों ने खड़े होकर जन गण मन गाना शुरू कर दिया और सावधान की मुद्रा में खड़े हो गए. इसी दौरान इस्तीफे की खबर आई और वहां जश्न का माहौल बन गया, जिसे शब्दों में बताना मुश्किल है.
धर्मेंद्र प्रधान की चिट्ठी में यह भी लिखा गया कि बच्चों को गुमराह किया जा रहा है, मगर देश के लिए यह फैसला लिया जा रहा है. पंकज झा के मुताबिक यह फैसला जिस मुद्दे को लेकर बहुत पहले हो जाना चाहिए था, वह अब बारह साल बाद आया है.
आगे की सियासी हलचल
पंकज झा ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी छवि को लेकर हमेशा सतर्क रहते हैं और चाहते हैं कि उन पर कोई सीधा असर ना पड़े. संसद के अंदर राहुल गांधी ने मांग रखी थी कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, गृह मंत्री अमित शाह और खुद प्रधानमंत्री तीनों इस्तीफा दें. यहीं से जवाबदेही तय करने का सवाल उठा. देश भर के छात्रों की मांग थी कि शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी तय हो, मगर प्रधानमंत्री लंबे समय तक इस्तीफा लेने को तैयार नहीं थे. इसे प्रधानमंत्री की जिद के तौर पर देखा जाने लगा था. प्रधानमंत्री खुद कहते रहे हैं कि देश में चार बड़ी जातियां हैं, गरीब, नौजवान, किसान और महिला. इसी वजह से सवाल उठ रहा था कि जब खुद युवाओं की मांग है तो सरकार उसे कैसे नजरअंदाज कर सकती है.
राहुल गांधी इस आंदोलन को प्रधानमंत्री आवास तक ले गए और वहां धरना दिया, जिससे दबाव और बढ़ गया. विपक्ष का पूरा ध्यान धर्मेंद्र प्रधान पर केंद्रित रहा, ताकि इस आंदोलन की आंच खुद उनके कार्यकर्ताओं तक ना पहुंचे. पंकज झा का कहना था कि इस्तीफा सरकार को खुद को बचाने के लिए लेना पड़ा. उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री मोदी का तरीका रहा है कि वे दबाव में तुरंत फैसला नहीं लेते, मगर इस बार उनकी छवि को झटका जरूर लगा है. करीब बारह साल बाद उनकी सरकार में यह पहला इस्तीफा हुआ है और यह फैसला बच्चों के लगातार अनशन और अड़े रहने के बाद ही संभव हो सका.