6 जून 2026 को दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन शुरू हुआ था. 28 जून को इस प्रदर्शन में सोनम वांगचुक शामिल हुए और भूख हड़ताल पर बैठ गए. 17 जुलाई की रात दिल्ली पुलिस ने एक गुप्त ऑपरेशन चलाकर उन्हें प्रदर्शन स्थल से उठाया और सफदरजंग अस्पताल पहुंचा दिया. इसके अगले दिन 19 जुलाई को वांगचुक का हाथ से लिखा एक पत्र सामने आया, जिसमें उन्होंने लोगों से 20 जुलाई को संसद की तरफ मार्च करने की अपील की. 20 जुलाई को हजारों लोग सड़कों पर उतरे, जिसके बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जबरदस्त झड़प हुई.

भूख हड़ताल और गिरफ्तारी की तैयारी

सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल जैसे जैसे लंबी होती गई, सरकार पर दबाव बढ़ता गया. 12 जुलाई को यह हड़ताल दो हफ्ते पार कर गई. सरकार के सामने तीन रास्ते थे. पहला, वांगचुक को ऐसे ही रहने देना, दूसरा, जबरन प्रदर्शन स्थल खाली कराना, और तीसरा, मंत्री का इस्तीफा लेना. तीनों रास्तों में सरकार की छवि पर असर पड़ने का खतरा था. इसी बीच 15 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल हुई, जिसमें कहा गया कि वांगचुक की सेहत बिगड़ रही है और उन्हें जबरन खिलाया जाना चाहिए. यह याचिका किसी परिजन या साथी ने नहीं, बल्कि एक निजी वकील रकेश कुमार सेन ने दाखिल की थी. 

16 जुलाई को कोर्ट ने मेडिकल जांच का आदेश दिया, लेकिन इस आदेश में जबरन खाना खिलाने या प्रदर्शन स्थल से हटाने की कोई बात नहीं थी. इसके बावजूद उसी दिन आरएमएल, सफदरजंग और लेडी हार्डिंग अस्पतालों को इस काम के लिए चुन लिया गया. 17 जुलाई को दिल्ली पुलिस कमिश्नर सतीश गोलचा को हटाकर आईबी के अनुराग कुमार को नया कमिश्नर बनाया गया. गोलचा का कार्यकाल 2027 तक था, इसलिए इतनी जल्दी हटाया जाना असामान्य माना गया. उसी रात नए कमिश्नर ने पुलिस अधिकारियों की बैठक बुलाकर वांगचुक को उठाने की योजना बनाई.

आधी रात का ऑपरेशन और पोटैशियम का विवाद

17 जुलाई की रात सभी थाना प्रभारियों को यह कहकर बुलाया गया कि संसद सत्र की तैयारी करनी है. असल में यह पूरा ऑपरेशन गुप्त रखने की चाल थी. 18 जुलाई तड़के सभी अधिकारियों को असली योजना बताई गई कि वांगचुक को अस्पताल ले जाना है, वह भी 30 सेकंड के अंदर, ताकि कोई फोटो या वीडियो न बना सके. पूरी योजना को तीन हिस्सों में बांटा गया. एक टीम डॉक्टर जैसे कपड़े पहनकर सफेद चादर की आड़ में वांगचुक को उठाने वाली थी, 

दूसरी टीम बाहर सुरक्षा संभाल रही थी, और तीसरी टीम वरिष्ठ अधिकारियों की थी जो पूरे ऑपरेशन को निर्देश दे रही थी. सुबह करीब साढ़े छह बजे जैसे ही मंच से जुड़े कार्यकर्ता अभिजीत डिप्के कुछ देर के लिए वहां से गए, पुलिस ने मोबाइल नेटवर्क बंद कर दिया और वांगचुक को उठा लिया. यह काम तीस सेकंड की जगह दो मिनट से ज्यादा समय में पूरा हुआ. इस दौरान कुछ लोगों के मोबाइल छीने गए और उन्हें पीटे जाने की बात भी सामने आई. 

अस्पताल पहुंचने पर बताया गया कि वांगचुक का पोटैशियम स्तर 2.9 है, जो दिल के लिए खतरनाक माना जाता है. लेकिन वांगचुक की पत्नी ने बताया कि एक दिन पहले यही स्तर 4.3 था, यानी सामान्य सीमा में था. निजी लैब से कराई गई जांच में अगले दिन यह स्तर 3.5 निकला. पत्नी ने कोर्ट के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि उसमें सिर्फ निगरानी की बात थी, अस्पताल ले जाने की सहमति के बिना उठाना गलत था.

20 जुलाई का मार्च और सड़कों पर टकराव

19 जुलाई को वांगचुक का हाथ से लिखा पत्र सामने आया, जिसमें उन्होंने खुद को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लिए जाने की बात कही और लोगों से 20 जुलाई को संसद तक मार्च करने की अपील की. यह खबर सोशल मीडिया पर तेजी से फैली. गूगल फॉर्म के जरिए साढ़े तीन लाख लोगों ने मार्च में शामिल होने के लिए साइन अप किया. 

छात्र संगठनों के कैंपस नेटवर्क और नीट परीक्षा दे चुके लाखों परिवारों ने भी इसमें हिस्सा लिया. 19 जुलाई रात को ही भीड़ इतनी बढ़ गई कि पुलिस ने बीएनएसएस की धारा 163 लगा दी, यानी पांच से ज्यादा लोगों का इकट्ठा होना अपराध घोषित कर दिया गया. फिर भी लोग जुटते रहे. पुलिस ने दिल्ली की सीमाओं पर जांच शुरू की और न्यू दिल्ली जिले को पंद्रह सुरक्षा क्षेत्रों में बांट दिया. मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया गया, जिसके बाद प्रदर्शनकारियों ने बिना इंटरनेट काम करने वाले ब्लूटूथ मैसेजिंग ऐप का इस्तेमाल शुरू किया. 20 जुलाई की सुबह वांगचुक की पत्नी अस्पताल से देर से पहुंचीं, जिससे नेतृत्व का इंतजार करती भीड़ बेकाबू होने लगी. सुबह करीब ग्यारह बजे प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड तोड़ने शुरू किए और संसद मार्ग की तरफ बढ़ने लगे. 

पुलिस ने लाठीचार्ज किया, आंसू गैस छोड़ी और कुछ जगहों पर छर्रे भी चलाए गए. कई वीडियो में महिलाओं और आम प्रदर्शनकारियों पर लाठियां बरसते देखी गईं. इस पूरी घटना में एक बड़ा सवाल यह भी उठा कि नीट जैसी परीक्षाओं में बार बार हो रहे पेपर लीक की वजह से छात्रों में गुस्सा पहले से ही बना हुआ था, और उन्हें इंसाफ की जगह लाठियां मिलीं.