दिल्ली पुलिस vs राज्य पुलिस: एक ही वादा, चार राज्यों में राहत मिली फिर भी दिल्ली में क्यों अटका छात्रों का मामला, अमित शाह की भूमिका पर उठे सवाल

July 31, 2026

छात्रों के आंदोलन के बाद सरकार ने वादा किया था कि प्रदर्शन करने वालों पर दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएंगे. बिहार, असम, महाराष्ट्र और कोलकाता में यह वादा निभाया भी गया. बिहार सरकार ने छात्रों के खिलाफ मुकदमे वापस लिए, असम में 13 बंद लोगों को छोड़ दिया गया, महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री फडनवीस ने हजार लोगों के नाम वाले मुकदमों में से 20 मुकदमे वापस लिए और कोलकाता सरकार ने भी कहा कि छात्रों पर कुछ नहीं होगा. सवाल सिर्फ दिल्ली को लेकर है, जहां अब तक एक भी मुकदमा वापस नहीं हुआ.

चार राज्यों में राहत, दिल्ली में अटका मामला

दिल्ली वही जगह है जहां जंतरमंतर पर प्रदर्शन हुआ और सड़क से संसद तक मार्च निकला. यहीं छात्रों पर पत्थरबाजी और पुलिस पर पैलेट गन चलाने तथा डंडे मारने के आरोप लगे. यहीं से यह भरोसा भी दिया गया कि छात्रों पर एफआईआर नहीं होगी. जिन चार राज्यों में बीजेपी सरकार है, वहां मुकदमे वापस ले लिए गए, मगर दिल्ली में जहां भी बीजेपी सरकार है, कोई प्रगति नहीं दिखी. फर्क सिर्फ इतना है कि बाकी राज्यों में पुलिस राज्य सरकार के अधीन काम करती है, जबकि दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय यानी अमित शाह के अधीन है. यही वजह है कि सवाल उठ रहा है कि यह देरी जानबूझकर है या कोई तकनीकी अड़चन है. छात्र संगठन सीजेपी ने चेतावनी दी है कि अगर एफआईआर वापस नहीं हुई तो प्रदर्शन फिर शुरू होगा.

सरकार ने तीन बातें कही थीं. पहली, एनडीए शासित राज्यों में प्रदर्शन करने वालों के सारे मुकदमे वापस होंगे. दूसरी, आगे नया मुकदमा नहीं बनेगा और इसकी लिखित गारंटी 28 जुलाई तक दी जाएगी. तीसरी, पेपर लीक की वजह से जान गंवाने वाले बच्चों के परिवारों को नियम के अनुसार अधिक मुआवजा मिलेगा. यह वादा 25 जुलाई को हुआ था, जब जेपी नड्डा और सांसद आशुतोष राणा से बातचीत के बाद 36 दिन का धरना और उसी दौरान शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ था. इसी भरोसे पर धरना समाप्त हुआ. संसद मार्च के बाद बिहार में 690 लोग हिरासत में लिए गए थे, जिनमें 300 से अधिक नाबालिग थे. दबाव के बाद बिहार गृह मंत्रालय ने सबको रिहा किया. असम ने भी पांच मामले वापस लेने का ऐलान किया और महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री का आदेश आया.

लिखित वादे और मौखिक वादे में फर्क होता है, इसलिए सीजेपी ने कागज पर गारंटी मांगी थी. तारीख सरकार ने खुद तय की थी, 28 जुलाई. सीजेपी का कहना है कि वह कागज उस दिन नहीं आया और आज तक नहीं आया. उसी दिन सीजेपी ने कहा कि यदि छात्रों को डराना बंद नहीं हुआ तो आंदोलन दोबारा शुरू होगा.

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दिल्ली में मुकदमे क्यों नहीं वापस हो रहे

दिल्ली में 20 मुकदमे दर्ज हैं, जिनमें तीन हत्या की कोशिश के और 12 दंगा भड़काने के हैं. पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक उस दिन 130 पुलिसकर्मी और 65 छात्र घायल हुए थे. कई पत्रकारों ने अपने ऊपर हुए हमलों को लेकर खुद मुकदमे दर्ज कराए हैं, जिन्हें उनकी सहमति के बिना वापस नहीं लिया जा सकता. अगर सारे मुकदमे एक साथ हटा दिए जाएं तो यह मान लिया जाएगा कि उस दिन कुछ हुआ ही नहीं, और यही असली दुविधा है.

प्रक्रिया की बात करें तो पहले सरकार को पुलिस को लिखित आदेश देना होता है, फिर पुलिस उपराज्यपाल के पास जाती है, उपराज्यपाल की मंजूरी के बाद अदालत को सूचित किया जाता है. फिलहाल यह फाइल पहले चरण से ही आगे नहीं बढ़ी है. दिलचस्प बात यह है कि किसान आंदोलन के दौरान दिल्ली में दर्ज 54 मुकदमों में से 17 वापस लिए जा चुके हैं, जिनमें 26 जनवरी की लाल किले हिंसा का मामला भी शामिल था. यानी हत्या की कोशिश और तोड़फोड़ जैसे गंभीर आरोपों वाले मुकदमे भी इसी प्रक्रिया से वापस हो सकते हैं, कानून में ऐसी कोई रुकावट नहीं है.

सरकार के पक्ष की बात करें तो पटना, गुवाहाटी और कोलकाता के अधिकतर मामले धरने और हिरासत से जुड़े थे, जबकि दिल्ली के 20 मुकदमों में हत्या की कोशिश तक के आरोप हैं. दोनों की तुलना बराबरी पर करना ठीक नहीं होगा. मगर असली सवाल सारे मुकदमे खत्म करने का नहीं है, सवाल उस छात्र का है जिस पर सिर्फ भीड़ में मौजूद रहने का आरोप है.

28 जुलाई तक गारंटी आनी थी, मगर उससे एक दिन पहले 27 जुलाई को 2873 लोगों का एक आंकड़ा सामने आया. दिल्ली पुलिस ने फेस रिकग्निशन सॉफ्टवेयर और सीसीटीवी की मदद से इन लोगों की पहचान की, जिनमें से 989 पर पहले से गंभीर मामले दर्ज बताए गए, जिनमें हत्या के 101, लूट-डकैती के 284 और हथियार से जुड़े 29 मामले शामिल हैं. यह आंकड़ा किसी अधिकारी ने अपने नाम के साथ रिकॉर्ड पर दर्ज नहीं कराया है. गौर करने वाली बात यह है कि यह 2873 लोग उन 20 मुकदमों में आरोपी नहीं हैं, बल्कि 20 से 25 जुलाई के बीच प्रदर्शन स्थल पर मौजूद वे लोग हैं जिन पर पहले से कोई पुराना मामला चल रहा था. कानून के अनुसार पुराने मामले किसी का सड़क पर खड़े होने का अधिकार नहीं छीनते.

फेस रिकग्निशन सॉफ्टवेयर दिल्ली पुलिस ने 2018 में गुम बच्चों को खोजने के लिए खरीदा था. इसे पहली बार 2019 में किसी भीड़ पर इस्तेमाल किया गया, फिर किसान आंदोलन की जांच में और अब जंतरमंतर प्रदर्शन में. सीजेपी का कहना है कि अगर भीड़ में अपराधी मौजूद थे तो पुलिस को अदालत जाकर उनकी पुरानी जमानत रद्द करानी चाहिए, पुराने आरोपियों के नाम पर नए मुकदमे नहीं बनने चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और आगे का रास्ता

28 जुलाई को सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस बख्शी और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मामले की सुनवाई की. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ आंदोलन होने से लाठीचार्ज जायज नहीं होता, शांतिपूर्ण प्रदर्शन संविधान से मिला अधिकार है और जिसने जरूरत से ज्यादा ताकत दिखाई उस पर कार्रवाई होनी चाहिए. कोर्ट ने 18 साल से कम उम्र के बिना रिकॉर्ड वाले बच्चों को तुरंत छोड़ने, जांच के लिए एसआईटी बनाने और सीसीटीवी, ड्रोन तथा बॉडी कैमरा फुटेज सुरक्षित रखने के निर्देश भी दिए. साथ ही कोर्ट ने पहले से दर्ज मुकदमों की जांच जारी रखने को भी कहा, और यही बात सीजेपी को नागवार गुजर रही है क्योंकि उन्हें सिर्फ राहत नहीं, पूरी तरह मुकदमों से छुटकारा चाहिए था.

आंकड़ों में भी असंगति दिखी. 20 जुलाई को पुलिस ने 118 पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात कही, अगले दिन यह संख्या 130 बताई गई. 28 जुलाई को अदालत में सरकार के वकील ने 250 से अधिक पुलिसकर्मियों के घायल होने का दावा किया. वहीं पुलिस के अपने आंकड़ों में 65 छात्र भी घायल बताए गए, लेकिन उनमें से किसी की शिकायत पर अब तक कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ. पुलिस ने यह भी दावा किया कि 480 से अधिक सोशल मीडिया हैंडल का संपर्क पाकिस्तान से मिला, जिसे अदालत में साबित करना बाकी है. दूसरी ओर कई तस्वीरों में सादे कपड़ों में लाठी लिए लोग वर्दीधारियों के साथ दिखे और कई जवानों की वर्दी पर नेमप्लेट नहीं थी, जो सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश के खिलाफ है. बिहार में छात्र प्रदर्शन के दौरान एके-47 चलाते जवान का वीडियो भी सामने आया.

अगली सुनवाई 3 अगस्त को होगी. सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी बनाने से पहले केंद्र और दिल्ली सरकार को अपना पक्ष रखने का समय दिया है. महाराष्ट्र, बिहार, केरल, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिवों को नोटिस भेजे गए हैं. इस बीच सीजेपी ने साक्षी नाम से एक पोर्टल बनाया है जहां प्रदर्शन की तस्वीरें और वीडियो जमा किए जा रहे हैं, ताकि सबूत सुरक्षित रहें, और मुकदमों का सामना कर रहे लोगों के लिए एक कानूनी सहायता कोष भी बनाया है.

सीजेपी से भी यह सवाल पूछा जा रहा है कि जब उसने खुद माना था कि भीड़ में गड़बड़ी करने वाले लोग घुसे थे, तो सबके लिए एक जैसी माफी क्यों मांगी जा रही है. सीजेपी का जवाब है कि गारंटी उन्होंने खुद के लिए नहीं, बल्कि उन लाखों बच्चों के लिए मांगी थी जिन्होंने सड़क छोड़कर बातचीत की मेज पर आना चुना. उनका डर है कि अगर बातचीत की मेज पर आने वालों के साथ भी वही हुआ जो सड़क पर डटे रहने वालों के साथ हुआ, तो आगे से कोई भी बातचीत की मेज पर नहीं आएगा.

अभी स्थिति यह है कि एक मेज पर आंदोलन खत्म हो गया, मगर दूसरी मेज पर लिखित कागज अब तक नहीं पहुंचा. सवाल वही बना हुआ है जो 25 जुलाई की शाम किसी ने नहीं पूछा था, अगर दिल्ली को इस वादे से बाहर रखना था तो यह बात उसी मंच पर, उन्हीं कैमरों के सामने क्यों नहीं कही गई.

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